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क्यों मैं दीवाली नहीं मनाती, क्यों राम मेरे आदर्श नहीं हो सकते हैं?

Why I Don't celebrate diwali

जिस देश में हर घंटे औसतन 4 रेप होते हो वहां दीवाली जैसा त्योहार मेरे किस काम का! जिस समाज में नवरात्रों में बच्चियां महफूज न हो उस देश में दीवाली और दूर्गा पूजा जैसे त्योहारों का मेरे लिए कोई महत्व नहीं. इस आडंबरवादी समाज की भावनाएं खोखली हैं. यह समाज स्वार्थ में जकड़ा हुआ समाज है. यहां के लोगों को दूसरों के दुख दर्द से शायद ही कुछ लेना देना है. सदियों से महिलाओं और बहुजनों का शोषण हो रहा है, लेकिन यह समाज और देश मौन की स्थिति में है. जैसे इस समाज ने अपनी सहमति दे दी हो महिलाओं के प्रति तमाम तरह के अत्याचारों के लिए.

मुझे यह कहने में बिल्कुल संकोच नहीं है कि भारतीय समाज एक बीमार और मरा हुआ समाज है. यहां हर तरह के शोषण को समाज का समर्थन प्राप्त है. जैसे हर धर्म में महिलाओं की स्थिति खराब है, कमोबेश वही स्थिति हिंदू धर्म में भी है. हजारो साल पहले लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी थी, लेकिन राम ने इसका प्रतिकार नहीं किया. जिस राम ने सीता के चरित्र की अग्निपरीक्षा ली, सीता को जंगल में रहने का हुक्म सुना दिया, बिना सीता का पक्ष जाने. भला वह मेरे आदर्श कैसे हो सकते हैं? कैसे मैं एक ऐसे व्यक्ति को आदर्श मान लूं जिसे अपनी पत्नी पर भरोसा न हो. यही नहीं राम ने शूद्र जाति के शंबूक का वध कर दिया, जिसका भी महिमामंडन ब्राह्मणवादी साहित्य ने कर दिया है और राम को महान बना दिया.

राम के अयोध्या लौटने के जश्न में दीवाली मनाई जाती है लेकिन क्यों राम को मानने वाला यह देश महिलाओं और वंचितों पर हो रहे शोषण के खिलाफ खड़ा नहीं हो पाता है! क्यों सो कॉल्ड राम के तथाकथित भक्त एक समुदाय के कत्लेआम के लिए आतुर है? राम के नाम पर भाईचारा और समाज को जोड़ने वाले कार्यक्रम क्यों नहीं दिखाई देते हैं? मैं क्यों मनाऊं ऐसे राम के लिए दीवाली जिसके अनुयायी महिलाओं और दलितों को आज भी गुलाम समझते हैं और उन्हें घूंट-घूंट कर रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं. आज राम के नाम पर दलितों. मुस्लिमों और महिलाओं के साथ कितना कुछ कर दिया जाता है, ऐसे राम… भगवान कहला सकते हैं क्या?

मैं 25 दिन की बेटी नित्या के इलाज के लिए एक कैंपेन चला रही हूं लेकिन समाज के समर्थ लोगों को इससे कुछ लेना देना नहीं है. उन्हें नहीं फर्क पड़ता कि बेटियां मार दी जा रही हैं, कभी गर्भ में तो कभी इलाज न मिल पाने के कारण. उनकी खोखली संवेदनाओं में मैं अपनी सहमति नहीं दे सकती. वे दीवाली मनाना चाहते हैं तो मनाएं लेकिन उनके मन में दूर-दूर तक प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती है. चाहे-अनचाहे वे लागातार ब्राह्मणवादी पित्तृसत्ता को मजबूत करने के लिए काम कर रहे हैं. महिलाओं के लिए आगे बढ़ने का रास्ता बंद कर रहे हैं.

राम को मानने वाला यह देश क्यों तमाम तरह के आडंबरों में उलझा हुआ है और सभी खुशी-खुशी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. आखिर क्यों महिलाओं के बीच से ऐसी आवाज़ नहीं आती है कि हमें नहीं बनना है सीता और न ही देनी है अग्निपरीक्षा. महिलाएं ही क्यों अग्निपरीक्षाएं देती रही हैं, महिलाएं ही क्यों अपने आप को सही साबित करते हुए मार दी जाती है, महिलाओं को ही क्यों झूठी इज्जत और शान का बोझ ढ़ोना पड़ता है, महिलाओं के ही सिर पर क्यों परम्परा का बोझ मढ़ा जाता है और क्यों महिलाओं को ही महिला के खिलाफ़ खड़ा कर दिया जाता है. राम जैसा व्यक्तित्व किसी महिला का तभी आदर्श बनना चाहिए था जब वो महिलाओं के साथ सच में खड़े रहते लेकिन ना वो खड़े हो पाए और ना उनके अनुयायी ऐसा करने में विश्वास रखते हैं, तो मैं क्यों खुश होऊं उनके आने पर क्यों मनाऊं दीवाली!

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