सोचो एक क्रिकेट मैच चल रहा है।
तुम मैदान में बैठे हो। खेल शुरू होता है। तभी नजर अंपायर पर जाती है। उसने बल्लेबाजी करने वाली टीम की जर्सी पहन रखी है।
तुम खड़े होकर कहते हो, यह गलत है।
अंपायर मुस्कुराता है। कहता है, कपड़ों की गलती हो गई। नोट कर लिया है।
अब बताओ। क्या तुम उस मैच पर भरोसा करोगे?
यही सवाल इस हफ्ते भारत में उठा।
केरल में चुनाव आयोग के एक दफ्तर से राजनीतिक दलों को एक आधिकारिक कागज भेजा गया। यह चुनाव से जुड़े निर्देशों का दस्तावेज था। लेकिन उस पर आयोग की मुहर नहीं थी। उस पर एक राजनीतिक दल की मुहर दिखाई दी।

आयोग ने इसे गलती बताया।
हो सकता है सच में गलती हो।
लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है।
एक कागज अचानक नहीं बनता। उसे तैयार किया जाता है। देखा जाता है। आगे बढ़ाया जाता है। फिर भेजा जाता है। इन सब चरणों में वह मुहर दिखती रही। और फिर भी वह बाहर चली गई।
यहीं से भरोसा हिलता है।
चुनाव आयोग का काम सिर्फ चुनाव करवाना नहीं है। उसका काम यह भरोसा बनाना है कि चुनाव निष्पक्ष हैं। कि मैदान बराबर है। कि अंपायर किसी टीम की जर्सी नहीं पहनता।
जब उस भरोसे पर सवाल उठता है, तब मामला तकनीकी नहीं रहता। वह लोकतांत्रिक हो जाता है।
और यह सवाल नया भी नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों में आयोग की भूमिका को लेकर लगातार बहस होती रही है। 2023 में एक कानून बदला गया, जिसके बाद चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया में बदलाव आया। पहले इसमें न्यायपालिका की भी भूमिका होती थी, अब सरकार की भूमिका अधिक प्रमुख मानी जा रही है।
सरकार इसे सुधार बताती है। आलोचक इसे संतुलन के कमजोर होने के रूप में देखते हैं।
इसी तरह, विपक्षी दलों ने समय-समय पर यह आरोप लगाया है कि आचार संहिता के मामलों में कार्रवाई समान नहीं रही। आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
मतदाता सूचियों को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। कई जगहों पर नाम हटने की शिकायतें आईं। आयोग का कहना है कि यह नियमित शुद्धिकरण प्रक्रिया है। विपक्ष इसे अपने मतदाताओं पर असर के रूप में देखता है।
सच क्या है, यह पारदर्शिता और जांच से ही साफ हो सकता है।
लेकिन एक बात साफ है।
जब ये बातें बार-बार सामने आती हैं, तो उन्हें सिर्फ “गलती” कहकर आगे बढ़ जाना काफी नहीं होता।
क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ प्रक्रिया से नहीं चलता। वह विश्वास से चलता है।
एक समय था जब चुनाव आयोग का नाम ही काफी था। टी.एन. शेषन जैसे लोग इस संस्था का चेहरा थे। उनके सामने हर दल एक दूरी बनाए रखता था। नियम सिर्फ कागज पर नहीं, व्यवहार में दिखते थे।
वह बहुत पुरानी बात भी नहीं है।
और आज, हम एक ऐसे दौर में हैं जहां एक मुहर भी चर्चा का विषय बन जाती है।
शायद इसलिए नहीं कि यह बहुत बड़ी घटना है।
बल्कि इसलिए कि यह एक संकेत है।
संकेत इस बात का कि हमें सतर्क रहना होगा।
हमें सवाल पूछने होंगे। बिना शोर के, लेकिन लगातार।
क्योंकि चुनाव सिर्फ वोट डालने का दिन नहीं होता। वह उस पूरी व्यवस्था पर भरोसे का दिन होता है।
तुम्हारा वोट उतना ही मजबूत है, जितना उसे गिनने वाली व्यवस्था।
अगर उस व्यवस्था पर भरोसा डगमगाता है, तो चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया रह जाता है। एक दृश्य। एक आयोजन।
और धीरे-धीरे, आदत बन जाती है।
गलत चीजों की आदत।
जब गलत बार-बार होता है, तो वह गलत लगना बंद हो जाता है।
संस्थाएं ऐसे ही कमजोर होती हैं। किसी एक बड़े झटके से नहीं। छोटे-छोटे समझौतों से।
उस दिन की मुहर शायद एक गलती थी।
लेकिन उसने एक काम जरूर किया।
उसने हमें रुककर सोचने पर मजबूर किया।
सवाल यह है कि क्या हम सच में रुके। या फिर आगे बढ़ गए, यह मानकर कि सब ठीक है।
मैच अभी भी चल रहा है।
अंपायर मैदान में है।
और हम दर्शक बने बैठे हैं।